“शिक्षक दिवस पर मंच को कैसे बनाए खास?” Teachers Day Speech In Hindi

शिक्षक दिवस (Teachers Day) पर सबका दिल जीतने की तरकीबें”

शिक्षक दिवस पर अगर भाषण देना है तो उसे खास और यादगार कैसे बनाया जाए? 🎤 यहाँ पाएँ आसान टिप्स और एक बेहतरीन Teachers’ Day Speech in Hindi, जिससे आप आत्मविश्वास से मंच पर बोलेंगे और सबका दिल जीत लेंगे। 🌸

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शिक्षक दिवस (Teachers Day ) पर गुरु का महत्त्व और इतिहास

भारत गुरु को सर्वोच्च मानने वाली ऐसी महान संस्कृति का देश है। गुरु का स्थान प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में बहुत महत्वपूर्ण होता है। क्योंकि गुरु जीवन को दिशा देता है, मार्ग दिखाता है और अंधकार में दीपक की तरह प्रकाश फैलाता है। सही मार्गदर्शन करने वाला प्रत्येक व्यक्ति गुरु होता है। जीवन की यात्रा में केवल विद्या ही नहीं बल्कि जीवन-मूल्य, नैतिकता, जिम्मेदारी और परिश्रम का महत्व सिखाने वाला जो कोई भी हो, वही सच्चा गुरु है। गुरु का होना बहुत आवश्यक है, अन्यथा जीवन को भटकने में समय नहीं लगता। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में कम से कम एक गुरु अवश्य होना चाहिए। हमारे देश में “गुरु” शब्द सुनते ही मन वंदन करने को प्रेरित होता है। गुरु का महिमा इतनी अपार है कि उसका वर्णन करना कठिन है। जीवन को सही मोड़ देने वाले पहले हमारे माता-पिता और उसके बाद सम्माननीय शिक्षक होते हैं। विद्यालयीन जीवन से लेकर शिक्षा पूर्ण होने तक अनेक शिक्षक हमें मिलते हैं और जीवन को स्वर्णिम बनाते हैं। वे हमें सही विचार देकर, सकारात्मकता का बीज बोकर और प्रेरणा देकर आगे बढ़ाते हैं। इसी कारण शिक्षक दिवस के अवसर पर हम डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन के बारे में जानेंगे।

शिक्षक दिवस (Teachers Day ) की विशेषता

शिक्षक दिवस शिक्षकों के सम्मान का एक विशेष दिन है। इस दिन किसी विशेष क्षेत्र में उनके योगदान या समाज के प्रति उनके कार्य की सराहना की जाती है। यह दिन उन व्यक्तियों को याद करने और कृतज्ञता व्यक्त करने का दिन है, जिन्होंने हमारे जीवन को दिशा दी है।

शिक्षक दिवस (Teachers Day ) की शुरुआत कैसे और कब हुई ?

शिक्षक दिवस मनाने की परंपरा 19वीं शताब्दी में कई देशों में शुरू हुई। अन्य अंतर्राष्ट्रीय दिनों से अलग, विभिन्न देश यह दिन अलग-अलग तिथियों को मनाते हैं। उदाहरण के लिए, अर्जेंटीना ने 1915 से 11 सितंबर को डोमिंगो फॉस्टिनो सर्मिएंटो की पुण्यतिथि को शिक्षक दिवस के रूप में मनाना शुरू किया। भारत में, हमारे दूसरे राष्ट्रपति डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन (5 सितंबर) का जन्मदिन 1962 से शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जाता है। वर्ष 2022 में शिक्षक दिवस को “आभार दिवस” के रूप में मनाया गया।

मित्रों, हमारे देश में एक ऐसे महान विद्वान हुए, जिन्होंने ज्ञान का दीप जलाया, दर्शनशास्त्र की गहराइयों को सरल भाषा में समझाया। उनका नाम है डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन। वे प्रख्यात दार्शनिक, आदर्श शिक्षक, प्रकांड पंडित और भारत रत्न से सम्मानित सर्वगुण संपन्न व्यक्तित्व थे। उनका जन्मदिन 5 सितंबर को आता है और इस कारण पूरे भारतवर्ष में इस दिन को शिक्षक दिवस के रूप में बड़े गौरव और सम्मान से मनाया जाता है।

शिक्षक दिवस (Teachers Day ) के उपलक्ष में डॉ. राधाकृष्णन का परिचय

शिक्षा क्षेत्र में अमूल्य योगदान देने वाले डॉ. राधाकृष्णन का जन्म एक गरीब ब्राह्मण परिवार में हुआ। उन्होंने कठिन परिस्थितियों में भी पूरी शिक्षा छात्रवृत्ति के आधार पर पूरी की। इतना ही नहीं, उन्होंने दर्शनशास्त्र विषय में एम.ए. की उपाधि भी प्राप्त की। उनकी ज्ञानलालसा और कठोर परिश्रम ने उन्हें निरंतर प्रगति की ओर अग्रसर किया। उन्होंने 1931 से 1936 तक आंध्र विश्वविद्यालय और 1939 में बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के कुलपति (Vice Chancellor) पद को अलंकृत किया। वर्ष 1917 में उन्होंने “The Philosophy of Rabindranath Tagore” नामक पुस्तक प्रकाशित की, जो भारतीय दर्शन और आधुनिक विचारों का संगम प्रस्तुत करती है।

डॉ. राधाकृष्णन की जयंती पर क्यों मनाया जाता है शिक्षक दिवस

आज हम जिस उल्लास और गर्व से डॉ. राधाकृष्णन का जन्मदिन शिक्षक दिवस के रूप में मनाते हैं, उसके पीछे उनका महान जीवन है। बचपन से ही वे कुशाग्र बुद्धि के धनी थे। पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने अध्यापन का कार्य शुरू किया और शीघ्र ही अपने विद्यार्थियों के आदर्श शिक्षक बन गए। उनकी शिक्षण पद्धति में केवल विषय ज्ञान ही नहीं बल्कि जीवन को सही दिशा देने वाले विचार भी समाहित रहते थे।

शिक्षक दिवस मनाने का इतिहास 1962 से प्रारंभ हुआ। जब डॉ. राधाकृष्णन स्वतंत्र भारत के दूसरे राष्ट्रपति बने, तब उनके छात्रों और मित्रों ने उनका जन्मदिन (5 सितंबर) धूमधाम से मनाने की इच्छा जताई। लेकिन उन्होंने विनम्रता से कहा कि “मेरा जन्मदिन अलग से मनाने के बजाय यदि इसे शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जाए तो मुझे अधिक खुशी होगी।” उनकी इस नम्रता और शिक्षकों के प्रति आदरभाव से प्रेरित होकर यह परंपरा प्रारंभ हुई।

डॉ. राधाकृष्णन का जीवन परिचय सारांश में

डॉ. राधाकृष्णन ने भारतीय दर्शन को पश्चिमी जगत से परिचित कराया। ब्रिटिश शासनकाल में भी वे भारतीय विचारधारा का गौरव दुनिया के सामने प्रस्तुत करने वाले प्रमुख चिंतक रहे। ऑक्सफर्ड विश्वविद्यालय ने उनकी स्मृति में “राधाकृष्णन मेमोरियल बेक्वेस्ट” नामक पुरस्कार की स्थापना कर उनके योगदान का सम्मान किया।

उनके जीवन में तीन प्रमुख प्रश्न थे। पहला प्रश्न यह कि नैतिक लेकिन तार्किक, विज्ञानोन्मुख लेकिन आध्यात्मिक प्रवृत्ति वाला नया मनुष्य कैसे बनाया जा सकता है? और क्या शिक्षा इस दिशा में सहायक हो सकती है? दूसरा प्रश्न यह कि प्राचीन भारतीय दर्शन को आधुनिक भाषा और शैली में पूरे विश्व के सामने कैसे प्रस्तुत किया जा सकता है? तीसरा प्रश्न यह कि मानव जाति का भविष्य बनाने के लिए सांस्कृतिक धरोहर का कितना उपयोग किया जा सकता है? उनके लेखन और भाषणों में इन तीनों प्रश्नों की छाप साफ दिखाई देती है।

डॉ. राधाकृष्णन का मानना था कि शिक्षक केवल ज्ञान देने वाला नहीं होता, बल्कि वह विद्यार्थियों में सोचने की क्षमता विकसित करता है, आत्मविश्वास जगाता है और सही मूल्यों की शिक्षा देता है। यही कारण है कि उन्होंने जीवनभर शिक्षक की भूमिका को सर्वोच्च स्थान दिया।

आज उनके जन्मदिवस पर पूरे भारत में विद्यालयों और महाविद्यालयों में शिक्षक दिवस बड़े उत्साह से मनाया जाता है। इस दिन छात्र अपने शिक्षकों को सम्मानित करते हैं, उपहार और शुभकामनाएं देकर आभार प्रकट करते हैं।

इसलिए मित्रों, अपने जीवन में गुरु स्थान पर विराजमान सभी शिक्षकों को इस दिन अवश्य वंदन करें और हृदय से कृतज्ञता व्यक्त करें। क्योंकि वास्तव में शिक्षक ही वह प्रेरणा, वह दिशा और वह संस्कारों की थाती हैं, जो जीवन की राह में हमें मार्गदर्शन देती रहती है।

शिक्षक दिवस (Teachers Day ) पर महात्मा फुले सावित्रीबाई फुले को सादर नमन

महात्मा फुले ने स्त्रियों और समाज के दुर्बल वर्गों के लिए शिक्षा के महत्व को समझा और उसी दिशा में कार्य किया।

1 जनवरी 1848 को उन्होंने पुणे में लड़कियों के लिए पहला स्कूल शुरू किया, जिसने शिक्षा के क्षेत्र में भारतीय समाज में क्रांति ला दी।

इसी के तहत उन्होंने जाति व्यवस्था को चुनौती दी और सामाजिक न्याय के लिए सत्यशोधक समाज की स्थापना की।

सावित्रीबाई फुले देश की पहली महिला शिक्षिका और मुख्याध्यापिका थीं।

उन्होंने अपने पति के साथ मिलकर स्त्री-शिक्षा का कार्य किया और लड़कियों को पढ़ाने की शुरुआत अपने ही घर से की।

स्त्री अधिकारों के लिए उनका कार्य और शिक्षा में योगदान इतना महत्वपूर्ण था कि उन्हें भारतीय नारीवाद की जननी माना जाता है। शिक्षक दिवस के उपलक्ष में इन महान विभूतियों को नमन करना हमारा परम कर्त्यव्य है |

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