माघी पूर्णिमा: बौद्ध धर्म में इसका महत्व और भगवान बुद्ध की महत्वपूर्ण शिक्षाएँ
माघी पूर्णिमा: बौद्ध धर्म में विशेष महत्व
माघी पूर्णिमा का बौद्ध धर्म में विशेष महत्व है। जानें कि इस दिन भगवान बुद्ध ने क्या उपदेश दिए, कैसे सारिपुत्र और मोग्गलायन ने धम्म ग्रहण किया, और बौद्ध अनुयायियों के लिए इस दिन के नियम।
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माघी पूर्णिमा का बौद्ध धर्म में महत्व | भगवान बुद्ध की शिक्षाएँ और इतिहास
एक वर्ष मे आनेवाली सभी 12 पूर्णिमा का बौद्ध धर्म में एक विशेष महत्व एवं स्थान है। भगवान बुद्ध के जीवन की कई महत्वपूर्ण घटनाएँ पूर्णिमा के दिन ही घटी थीं। जैसेकी हम सबको पता है कि, वैशाख पूर्णिमा को बुद्ध पूर्णिमा के रूप में जाना जाता है, जिस दिन सिद्धार्थ गौतम का जन्म हुवा, उनको ज्ञान कि प्राप्ति हुई और इसी पूर्णिमाको उनका महापरिनिर्वाण हुआ था। इसी प्रकार, आषाढ़ी पूर्णिमा, कार्तिक पूर्णिमा और माघी पूर्णिमा का बुध्द के जीवन मे एवं बौद्ध धर्म में एक विशेष महत्व प्राप्त है।

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भगवान बुद्ध और माघी पूर्णिमा कि घटनाए
माघी पूर्णिमा के ऊन दिनो तथागत भगवान बुद्ध उनकी प्रिय नगरी वैशाली में महा भिक्षु संघ के साथ विराजमान थे। इसी पूर्णिमा के दिन उन्होंने अपने भिक्षुओ के समक्ष एवं आनंद को बुलाकर महापरिनिर्वाण की घोषणा की थी। उन्होंने अपने प्रिय शिष्य आनंद से कहा कि वे तीन माह पश्चात कुशीनगर में महापरिनिर्वाण प्राप्त करेंगे।
ऐसा माना जाता है कि, इस संवाद के दौरान ‘मार’ (मारा) ने आनंद के चित्त को भ्रमित कर दिया, जिससे वे भगवान बुद्ध से आग्रह नहीं कर सके कि वे अधिक समय तक इस संसार में रहें। जब मार ने आनंद के चित्त को मुक्त किया, तब आनंद ने भगवान बुद्ध से आग्रह किया कि वे बहुजनो के कल्याण के लिए और बहुजनो के सुख के लिए अधिक समय तक जीवित रहें। परंतु बुद्ध ने उस समय उत्तर दिया कि अब कुछ भी संभव नहीं है, क्योंकि सम्यक संबुद्ध जब कोई बात तीन बार कह देते हैं, तो वे उससे पीछे नहीं हटते। यह घटना जिस दिन घटित हुई वह दिन माघ पूर्णिमा का था इसीके कारन बुध्द जगत मे इस पूर्णिमा का अनन्यसाधारन महत्व है ।
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सारिपुत्र और मोग्गलायन का बुधद धम्म प्रवेश
माघी पूर्णिमा का एक और अन्य महत्वपूर्ण घटना यह है कि इसी दिन भगवान बुद्ध के धम्म के दो प्रमुख सेनापती शिष्य सारिपुत्र और मोग्गलायन धम्म में दिक्षित हुए थे। बुद्ध ने उन्हें धम्म-देशना दी और वे दोनो उनके प्रमुख शिष्य बन गए।
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भगवान बुध्द का वैशाली में अंतिम उपदेश
माघी पूर्णिमा के दिन ही वैशाली में तथागत भगवान बुद्ध ने अपने भिक्षु संघ को संबोधित करते हुए कहा कि तीन माह के पश्चात वे महापरिनिर्वाण प्राप्त करेंगे ऐसी घोषणा कि थी। उन्होंने अपने अपने भीक्षुओ तथा अपने शिष्यों से अंतिम उपदेश मे यह शिक्षा दी कि बुध्द के महापरिनिर्वान के बाद बुद्ध के शरीर का नहीं अपितू बुध्द के शिक्षाओं का अनुसरण करना चाहिए। बुद्ध शासन ही उनका सच्चा मार्गदर्शक होगा।
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बौद्ध अनुयायियों के लिए माघी पूर्णिमा के दिन के नियम
माघी पूर्णिमा के दिन बौद्ध अनुयायियों को विशेष रूप से इन नियमों का पालन करने का निर्देश दिया जाता है:
अष्टशील का पालन करना: सभी ग्रहस्थ अनुयायी इस दिन विशेष रूप से अष्टशील का पालन करते हैं।
भिक्षु संघ को दान देना: भोजन, वस्त्र, औषधि आदि का दान देकर पुण्य अर्जित किया जाता है।
धर्म श्रवण करना: विहारों में जाकर एवं बौध्द भिक्षुओ से वार्तालाप कर बुद्ध वचन सुनना आवश्यक महत्वपुर्ण माना जाता है।
ध्यान और साधना: इस दिन विशेष रूप से ध्यान (विपस्सना) किया जाता है ताकि आत्मिक सुख और मन को एकाग्र करने मे मदत हो सके ।
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माघी पूर्णिमा का आधुनिक महत्व
आज भी बौद्ध अनुयायी इस दिन को विशेष रूप से पूजन, ध्यान, और दान कार्य करकर मनाते हैं। भारत, श्रीलंका, थाईलैंड, म्यांमार और अन्य बौद्ध देशों में यह दिन बड़े हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। इस अवसर पर बौद्ध मठों और विहारों में विशेष कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं।
- निष्कर्ष
माघी पूर्णिमा न केवल भगवान बुद्ध के जीवन की महत्वपूर्ण घटनाओं से जुड़ी है, बल्कि यह बौद्ध अनुयायियों के लिए भी एक महत्वपूर्ण बुध्द के मार्ग का अनुसरन करने का एक सुनहरा अवसर है। इस दिन की गई साधना और दान-पुण्य से व्यक्ति आत्मिक उन्नति प्राप्त करता है ऐसी धारना है । इसलिए, माघी पूर्णिमा को एक पवित्र और शुभ दिन माना जाता है।
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सभी को माघी पूर्णिमा की मंगलकामनाएँ!
